एक शहर से प्यार होना थोडा कठिन है. पर हमे वो हुआ, और काफी जोरों से हुआ.
सन १९९५ , फ़रवरी का महीना था वो शायद. हम ने पहली बार हबीबगंज रेलवे स्टेशन देखा.उस समय वो काफी अकेला सा था. एक छोटी सा स्टेशन था वो और एक्का दुक्का ट्रेन ही वहाँ रूकती थी. उस समय हमने पहली बार भोपाल को देखा था और देखते रह गए.
फ़र्ज़ कीजिए फ़रवरी की ठंडी सुबह जो हलकी सी धुँध से नहाई हुई है और उस ठंढ़ में आप एक छोटे से स्टेशन पे उतरे जहाँ ५-१० लोगो कि ही भीड़ हो. कुछ ऐसा ही दृष्य था उस समय. अभी भी याद करते हैं तो रोएं खड़े हो जाते हैं.
वो था हमारा पहला पल जब हमे भोपाल से प्यार हुआ. या यूँ कहिये कि हबीबगंज से प्यार हुआ. जो समय के साथ और गहरा होता चला गया.
